uttam tyag Status - उत्तम त्याग स्टेटस

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 रात्रि भोजन त्याग और देव दर्शन करने वाला ही सच्चा जैन है।।

उत्तम त्याग स्टेटस

आज उत्तम त्याग का दिन है।।

त्याग जो करेगा , सम्मान वही पाएगा।।

संग्रह जो करेगा, वही पतन को पाएगा।।

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उत्तम त्याग स्टेटस

दुनिया आप के दान की भूखी नहीं, वह आपके उस अत्याचार से पीड़ित हैं। जो आप धन कमाने के लिए करते हैं। दान बहुत बड़ा पुण्य है, लेकिन उसके लिए पाप करके धन इकट्ठा करना बहुत बड़ी बेवकूफी है।।

 

उत्तम त्याग स्टेटस
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दुनिया त्यागी का गुणगान करती है ,रागी का नहीं।।

इस संस्कृति में त्यागी को नमस्कार किया गया है, रागियो को नहीं।।

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उत्तम त्याग स्टेटस

त्याग धर्म ही जगत लगावे पार है।

त्याग धर्म ही निश्चय से भव पार है।।

उत्तम त्याग धर्म धारी गुरु है, कहे।

मन वच तन से ध्याऊं, चरण में है रहे ‌‌।।

उत्तम त्याग स्टेटस

यह धर्म हमारा, जग से न्यारा, उत्तम त्याग बताता है।।

 

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उत्तम त्याग स्टेटस

शुभ त्याग की महिमा, त्याग की गरिमा। मुक्तिपथ दिलवाता है। हो मन की शुद्धि, हो तन की शुद्धि, पूजा करने आया हूं।। उत्तम तपधारी, मुनि हमारे, चरणों में शीश झुकाता हूं।।

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गुरुवर कहते हैं। दान चार प्रकार का होता है, मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका यह चार प्रकार के संघ को देना चाहिए।। क्योंकि धन तो बिजली की चमक के समान प्रकाशवान है।।

उत्तम त्याग स्टेटस

वस्तु का त्याग ही त्याग नहीं है, उसके साथ राग का भी त्याग करो।।

 

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त्याग एक ऐसा सरोवर है। जिसके पास जाने पर भी गर्म लू भी ठंडी बन जाती है।।

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अपने आप पर अधिकार करने के लिए भी त्याग की आवश्यकता है।।

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जिससे कुलाचार और श्रावक धर्म नष्ट होता है, ऐसी वस्तुओं का दूर से ही त्याग कर देना चाहिए।।

 

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उत्तम धर्म हमें यही सिखाता है,मन को संतोष बनाओ की इच्छा और भावनाओं का त्याग करना मुमकिन है।।

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 त्याग भावना भी तेरी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही होती है।।

 

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पवित्र वस्तु कुत्तों को ना दो, अपने मोती सूअरों के आगे ना फेकू।।

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बुद्धिमान व्यक्ति को बचपन से ही भक्ति धर्म का अनुशीलन करना चाहिए।।

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थोड़ी भी काम ना रहने पर भगवान को नहीं पाया जा सकता।।

जैसे हल्की गांठ रहने पर सुई के भीतर धागा नहीं जाता।।

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विषम त्याग और आसक्ति त्याग होने पर प्रेम की प्राप्ति होती है।।

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यदि मन में विषय वासना का उदय ना हो, अभी अर्थात त्याग हुआ।।

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जब तक ईश्वर की इच्छा नहीं होती, जब तक उनका दर्शन नहीं होता।।

 

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अहंकार का पूर्णता  त्याग ना होने पर ईश्वर की कृपा नहीं होती।।

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जिस प्रकार रेशम का कीड़ा अपनी रेशों से घर बनाकर उसमें बंध हो जाता है।।

उसी प्रकार संसारी जीव अपने कर्मों से स्वयं बंध हो जाता है।।

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दान, आमदनी का 10 प्रतिशत ही नहीं, अपने समय का ,कार का उपयोग भी धर्म के खाते में 10 प्रतिशत जाना चाहिये ।

मुनि श्री सुधासागर जी


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एक कंजूस सेठ को बावर्ची ने बहुत घी लगी हुयी रोटी दी ।

सेठ नाराज हुआ, इतना घी !!!

बावर्ची बोला क्षमा करें, गलती से मेरी रोटी आपके पास आ गयी ।

उपयोग नहीं करोगे तो चोर उसका दुरुपयोग करेंगे ।

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हाथी के एक कौर में से एक छोटा सा टुकड़ा गिर जाने से हजारों चीटिंयों का पेट भर जाता है ।

तो क्यों ना दान करें।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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त्यागी हुयी चीजों को तो पशु भी वापिस नहीं स्वीकारते,

चाहे वह त्यागी हुयी चीज उनके बच्चे की ही क्यों ना हो ।

श्री लालामणी भाई


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